मिथिला काला
मिथिला कला शैली और टिकली कला शैली बिहार के लोक कला है विश्व स्तर पर बिहार की पहचान मिथिला चित्रकला के कारण भी है इस विश्व प्रसिद्ध लोक कला का जन्म बिहार के मधुबनी जिले के अनपढ़ और प्रशिक्षित और घरेलू मैथिली महिलाओं के द्वारा हुआ इस सुंदर कला को आज भी मुख्य रूप से मिथिलांचल के कुछ प्रमुख जिले मधुबनी सीतामढ़ी शहर से सुपौल समस्तीपुर और पूर्वी मुजफ्फरपुर में महिलाओं ने जिंदा रखा है आज भी बिस्तर पर टिकली कला शैली के सुंदर चित्रों की अपेक्षा मिथिला कला शैली के चित्रों की मांग सबसे अधिक है
मिथिला कला शैली एक बिहारी लोक चित्रकला है इसे मधुबनी चित्रकला भी कहते हैं इस शैली में मुख्यतः महिलाएं ही चित्रांकन करती है मिथिला कला शैली का स्थान भारतीय कला ही नहीं बल्कि विश्व कला जगत में भी बहुत ही महत्वपूर्ण है इस कला का जन्म बिहार के मधुबनी जिले में हजारों वर्ष पहले हुआ था यह एक विश्व प्रसिद्ध बिहारी लोक कला है इसे मुख्यतः अप्रशिक्षित और अनपढ़ महिलाओं ने अपनी मां से सीख कर अभी तक जिंदा रखा है मिथिलांचल के मुख्य जिले जहां अभी भी महिलाएं मैथिली में चित्रांकन करती है ओए जिला है मधुबनी सीतामढ़ी मुजफ्फरपुर समस्तीपुर सहरसा सुपौल इस शैली में प्राकृतिक रंगों का उपयोग चित्र रंगने के लिए होता है कागज के सबसे अधिक हैंडमेड पेपर का उपयोग होता है पहले महिलाएं तूलिका के लिए पूर्वी को लपेटकर उपयोग करती थी आधुनिक युग में महिलाएं कोमल बालों का उपयोग चित्रों को जल रंग से रंगने के लिए करती थी इन चित्रों को टेढ़ी-मेढ़ी और सरल दिखाओ द्वारा स्वतंत्र भाव से चित्रण किया जाता है अधिकांश चित्रों में पुरुष या स्त्री के सामने वाले भाग की अपेक्षा कहीं चित्रण किया जाता है एक आंख ही दिखाई देता है चारों ओर काला तेरे होते हैं मुख्य पात्रों को दो रेखाओं द्वारा चित्रित किया जाता है होते हैं धार्मिक देवी देवताओं के चित्र दुर्गा काली सरस्वती पार्वती महादेव हनुमान दशावतार रामायण महाभारत श्री कृष्ण इत्यादि मिथिला संस्कृति और संस्कार इसके अंतर्गत मिथिला संस्कृति यगोपवित संस्कार त्यौहार आते हैं इसके अंतर्गत मिथिला संस्कृति पर आधारित वैवाहिक संस्कार के अंतर्गत विवाहित दंपति के लिए वैवाहिक संबंध और मधुरता लाने के लिए प्रेम संबंध पर आधारित होते हैं..................Read more
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मिथिला कला शैली और टिकली कला शैली बिहार के लोक कला है विश्व स्तर पर बिहार की पहचान मिथिला चित्रकला के कारण भी है इस विश्व प्रसिद्ध लोक कला का जन्म बिहार के मधुबनी जिले के अनपढ़ और प्रशिक्षित और घरेलू मैथिली महिलाओं के द्वारा हुआ इस सुंदर कला को आज भी मुख्य रूप से मिथिलांचल के कुछ प्रमुख जिले मधुबनी सीतामढ़ी शहर से सुपौल समस्तीपुर और पूर्वी मुजफ्फरपुर में महिलाओं ने जिंदा रखा है आज भी बिस्तर पर टिकली कला शैली के सुंदर चित्रों की अपेक्षा मिथिला कला शैली के चित्रों की मांग सबसे अधिक है
मिथिला कला शैली एक बिहारी लोक चित्रकला है इसे मधुबनी चित्रकला भी कहते हैं इस शैली में मुख्यतः महिलाएं ही चित्रांकन करती है मिथिला कला शैली का स्थान भारतीय कला ही नहीं बल्कि विश्व कला जगत में भी बहुत ही महत्वपूर्ण है इस कला का जन्म बिहार के मधुबनी जिले में हजारों वर्ष पहले हुआ था यह एक विश्व प्रसिद्ध बिहारी लोक कला है इसे मुख्यतः अप्रशिक्षित और अनपढ़ महिलाओं ने अपनी मां से सीख कर अभी तक जिंदा रखा है मिथिलांचल के मुख्य जिले जहां अभी भी महिलाएं मैथिली में चित्रांकन करती है ओए जिला है मधुबनी सीतामढ़ी मुजफ्फरपुर समस्तीपुर सहरसा सुपौल इस शैली में प्राकृतिक रंगों का उपयोग चित्र रंगने के लिए होता है कागज के सबसे अधिक हैंडमेड पेपर का उपयोग होता है पहले महिलाएं तूलिका के लिए पूर्वी को लपेटकर उपयोग करती थी आधुनिक युग में महिलाएं कोमल बालों का उपयोग चित्रों को जल रंग से रंगने के लिए करती थी इन चित्रों को टेढ़ी-मेढ़ी और सरल दिखाओ द्वारा स्वतंत्र भाव से चित्रण किया जाता है अधिकांश चित्रों में पुरुष या स्त्री के सामने वाले भाग की अपेक्षा कहीं चित्रण किया जाता है एक आंख ही दिखाई देता है चारों ओर काला तेरे होते हैं मुख्य पात्रों को दो रेखाओं द्वारा चित्रित किया जाता है होते हैं धार्मिक देवी देवताओं के चित्र दुर्गा काली सरस्वती पार्वती महादेव हनुमान दशावतार रामायण महाभारत श्री कृष्ण इत्यादि मिथिला संस्कृति और संस्कार इसके अंतर्गत मिथिला संस्कृति यगोपवित संस्कार त्यौहार आते हैं इसके अंतर्गत मिथिला संस्कृति पर आधारित वैवाहिक संस्कार के अंतर्गत विवाहित दंपति के लिए वैवाहिक संबंध और मधुरता लाने के लिए प्रेम संबंध पर आधारित होते हैं..................Read more
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